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मैं इस उम्मीद पे…

मैं इस उम्मीद पे…

Vishal
मैं इस उम्मीद पे

कवि विशाल आनंद की यह भावुक कविता शादीशुदा ज़िंदगी की उपेक्षा, टूटती उम्मीदों और एक पत्नी के अनकहे दर्द को बेहद ख़ूबसूरती से बयां करती है।

मैं इस उम्मीद पे रूठी की तुम मना लोगे
कहोगे सॉरी और पहले सा गले लगा लोगे
गुज़र गया है ज़माना गले लगाए हुए
मज़े विसाल के मुद्दत हुई उठाये हुए
गले लगाओ भी तो पहले सी वो बात कहाँ
को हमने साथ गुज़ारी वो पहली रात कहाँ
कभी था वक़्त जब हर बात मुझे बताते थे
सलाह भी लेते थे और साथ सर हिलाते थे
अब तो हर बात मुझे ग़ैरों से पता चलती है
कुछ हमें बताने की तुम्हें फुर्सत कहाँ मिलती है
मैं इस उम्मीद पे बैठी की तुम चौंका दोगे
मेरा जन्मदिन भूल जाने का हसीन धोखा दोगे
इक प्यार से दिया फूल भी खिला के मन मेरा
ये जता देता कि तुम्हें याद रहा ये दिन मेरा
अब तो ये दिन भी मगर यूँ ही गुज़र जाता है
मेरा सनम मेरे लिए अब वक्त कहाँ पाता है
मैं इस उम्मीद पे लेटी कि तुम बना दोगे
जो बनाते थे अक्सर सुबह चाय की प्याली
हो बला की ख़ट ख़ट मगर अब चैन से हो सोते
तुम्हें नींद है प्यारी, कैसी आदत ये है डाली
न तो चीज़ों का पता है ना बच्चों की है चिंता
अब तुम ही ज़रा सोचो ये फ़र्ज़ मेरा ही बनता?
मेरे समझौतों की तारीफ़ें मेरी कुर्बानियों के किस्से
कभी कहते थे लोगों से ख़ुद अपने ही मुँह से
मैं वही हूँ मेरे जाना मेरी दुनिया है तुम्ही से
पास बैठो जो कभी तुम तो बात करना हमीं से
मैं ये सोच के बैठी की तुम घुमा लोगे
बहती नज़रें जो किसी और तरफ़ जाती हैं
कार चलती है तो सोचते हो कि नादान हूँ मैं
ये जो बीवी है ये नस नस को समझ जाती है
जिन हसीनाओं को देख मचल जाते हो अक्सर
कभी हम में भी उड़ती थी ये ख़ुशबूएँ सारी
आज प्याज़ों की महक हाथों में लहसुन की बदन से
मैंने ख़ुद को मिटाकर है ये गृहस्थी सँवारी
मैं इस उम्मीद पे सुनती हूँ के तुम सजा दोगे
इस घर के आईने में वो पहले सी तस्वीरें
जी तुम बाहर की रंगीनियों की अंदर ही कहीं खोजो
तुम्हें घर में ही मिल जायँगी खूबसूरत सी ज़ंजीरें
ये बातें जो मैं पहले कभी कह ना सकी थी
क्या खूब के ये नज़्म इन्हें बना दे नज़ीरें
वैसे तो बहुत खूब हो तुम प्यारे पतिदेव
माफ़ करना मुझे तूँ जी चुभ जाएँ ये तीरें
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