शहर से जब मैं तन्हा निकला और कुछ रचनाएँ
Polymath and author, Dr. Vishal Anand, blends expertise in Political…
विशाल, एक प्रकाशित लेखक हैं जो हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में लिखते हैं। उन्होंने ग़ज़लों और शेर-ओ-शायरी के कई प्रशंसित संग्रह लिखे हैं।यहाँ हम उनकी कुछ रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं, इस उम्मीद के साथ कि आप उनकी सराहना करेंगे और उनके साहित्यिक कौशल का आनंद लेंगे।
1
शहर से जब मैं तन्हा निकला
क्या सोचा था, क्या–क्या निकला
दिल, सोचा था, पत्थर होगा
दिल तो एक खिलौना निकला
उनकी यादों में डूबा – सा
फुर्सत का हर लम्हा निकला
गम , कहते थे, कुछ पल होगा,
जीवन भर का किस्सा निकला
किस् से कहते, दिल की बातें,
जो भी था वो रुसवा निकला
दिल दरिया, और आखें भीगी,
‘तन्हा’ फिर भी प्यासा निकला।
2
एक अरसे के बाद शहर में सूरज ने मुंह दिखाया है
लगता है अब आज गांव में मां ने मुस्कुराया है
कल शहर बसाने के लिए जो दरख़्त काटा जाएगा
आज उसकी एक शाख पर परिंदे ने घर बनाया है
उन खंडहरों की मुंडेर पर एक तन्हा बबूल का पेड़ है
आज उसकी सूखी डाल पर एक नया पत्ता आया है
ऐसी शाम ऐसी आई थी तुम मुझसे लिपट कर रोए थे
3
रोज वो नए अज़ाब सिलती है
जिंदगी हादसों में पलती है
रोज हम ख्वाब नए बुनते हैं
रोज एक नई शम्मा जलती है
जिससे रोशन किसी की दुनिया है
किसी की जिंदगी पिघलती है
आरजू जिसकी दिले नांदां को है
ववो शय हमको कहां मिलती हैं
4
मैं सुबह अपनी शौक़ से कुर्बान कर चलूं
मेरा किसी की शाम को अफसोस भी तो हो
हम अपनी बात कह दें हो यह हौसला जरूर
उनके लब रुकें वो जरा खामोश भी तो हों
उनके दिलों के राज वो हमसे कह तो दें जरा
पीने को पी रहे हैं मगर मदहोश भी तो हों
यूं जवानी भी आजकल बुढ़ापे सी कट रही है
जीने को जी रहे हैं मगर कुछ जोश भी तो हो
मैं बेशक तमाम उम्र उससे लिपट कर गुजार दूं
वो मेरे हमसफर का मगर आगोश भी तो हो
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Polymath and author, Dr. Vishal Anand, blends expertise in Political Science, wellness, and sports. He's a published writer in three languages and the host of the "LIFE THERAPIES" podcast. A certified meditation expert and tennis coach, he founded WeaveMyStory.com and runs a wellness retreat in Dehradun.
